आरती कुंजबिहारी की लिरिक्स हिंदी में | Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics in Hindi (Original)

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आरती कुंजबिहारी की लिरिक्स

 आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की। गले में बैजंती माला,बजावै मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला,नंद के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली,राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली;भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चन्द्र सी झलक;ललित छवि श्यामा प्यारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ -2 कनकमय मोर मुकुट बिलसै,देवता दरसन को तरसैं। गगन सों सुमन रासि बरसै;बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ -2 जहां ते प्रकट भई गंगा,कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा। स्मरन ते होत मोह भंगा;बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ -2 चमकती उज्ज्वल तट रेनू,बज रही वृंदावन बेनू। चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ -2 आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ -2 विशेष:- आरती कुंजबिहारी की' भगवान श्री कृष्ण के मनमोहक बाल स्वरूप और उनकी दिव्य लीलाओं का सजीव चित्रण करती है, जिसे श्रद्धापूर्वक गाने से भक्तों के हृदय में प्रेम और भक्ति का संचार होता है। इस आरती में प्रभु के श्री अंगों की कांति, गले की वैजयंती माला, कानों के कुंडल और उनके माथे पर सुशोभित कस्तूरी तिलक का अद्भुत वर्णन है, जिसके स्मरण मात्र से ही मनुष्य के जन्म-मरण के सांसारिक फंदे कट जाते हैं और उसे अष्ट सिद्धि एवं नवनिधि जैसे उत्तम फलों की प्राप्ति होती है। नियमित रूप से यह आरती करने से घर के सभी क्लेश और बाधाएं दूर होती हैं, साथ ही भगवान गिरिधर गोपाल की दयादृष्टि से दीन-दुखियों के संकट पल भर में समाप्त होकर जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक आनंद का आगमन होता है |
       ॥ इति ॥

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