जादू कर गयो यशुमति को ये लाल लिरिक्स - मुकुल द्विवेदी | Jadu Kar Gayo Yashumati Ko Ye Lal Lyrics
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॥ जय श्री राम ॥
याके नैना कारे है कमाल, हो जादू कर गयो यशुमति को ये लाल |
1. नींद ना आवे मोहे सतावे, सौत मुरलिया मोहे जगावे |
शेर :- श्याम ये इश्क़ की रीत अनोखी है, नहीं कटदी वैद्य हकीमो तो |
तेरे इश्क़ में मरजा कटजावण, मेरे दिल द चारा तू है ||
मेरे दिल द चारा तू है || - 2 ....
नींद ना आवे मोहे सतावे, सौत मुरलिया मोहे जगावे |
आधी रात में छेड़े तान, जादू कर गयो यशुमति को ये लाल ||
2. प्रेम की बातें तू क्या जाने, बस अपनी अपनी तू ठाने |
शेर:- सामने बैठे रहो दिल को करार आएगा, जितना देखेंगे तुम्हे उतना ही प्यार आएगा |
प्रेम की बातें तू क्या जाने, बस अपनी अपनी तू ठाने |
प्रेम में होवे न सवाल, जादू कर गया यशुमति को ये लाल ||
तुझे देखके दिल भरता ही नहीं अब जाऊ कहाँ में सांवरिया |
पिया छोड़ गए दिल तोड़ गए, अब बांके फिरू में बाबरिया ||
जय जय राधा रमण प्यारो राधा रमण........................|
विशेष:- 'सौत मुरलिया' का अनोखा रहस्य: भजन के पहले अंतरे में गोपियाँ बांसुरी को 'सौत' (Co-wife) कहकर संबोधित करती हैं। ब्रज के संतों के अनुसार, गोपियाँ ठाकुर जी की मुरली से ईर्ष्या (जलन) इसलिए करती थीं क्योंकि गोपी-गीत और वेणु-गीत में वर्णन आता है कि जो अधरामृत (होठों का रस) गोपियों को बड़ी तपस्या के बाद मिलता था, वह मुरली दिन-रात ठाकुर जी के होठों से लगकर सहज ही पीती रहती थी। आधी रात को जब ठाकुर जी तान छेड़ते थे, तो गोपियों की नींद उड़ जाती थी। यह कोई साधारण लोक-गीत नहीं बल्कि ब्रज रस का 'वेणु-गीत' भाव है। सूफ़ी और ब्रज रस का महा-मिलन: इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका सर्व-समावेशी भाव है। ब्रज की 'यशुमति के लाल' की महिमा गाते-गाते अचानक संगीतकार सूफ़ी रंग में डूब जाता है और पंजाबी का प्रसिद्ध शेर पढ़ता है— "नहीं कटदी वैद्य हकीमो तो..."। यह दिखाता है कि जब प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर होता है, तो भाषा की सीमाएँ टूट जाती हैं। अंत में राधा रमण जी के महा-मंत्र का संकीर्तन पूरे वातावरण को शुद्ध कर देता है।
॥ इति ॥
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