फैसला दरबार का सांवले सरकार का लिरिक्स - राज पारीक | Faisla Darbar Ka Sanwle Sarkar Ka Lyrics
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॥ जय श्री राम ॥
फैसला दरबार का, सांवले सरकार का |
मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है ||
1. हमने देखी तेरी अदालत, चलती नहीं किसी की वकालत |
ये है दर इन्साफ का, जो हुकुम हो आपका |
मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है ||
2. अपनी तो है अर्ज़ी बाबा, आगे तेरी मर्ज़ी बाबा |
काम नहीं तकरार का, हमको रिश्ता प्यार का |
मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है ||
3. बनवारी और कुछ न कहना, हमको तेरी शरण में रहना|
में हूँ सेवक आपका, जो हुकुम माई बाप का |
मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है ||
फैसला दरबार का, सांवले सरकार का |
मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है, मंजूर है ||
विशेष:- 'अदालत और वकालत' के पीछे की अमर कथा: इस भजन में सांवले सरकार को "न्यायाधीश" (Judge) माना गया है— "हमने देखी तेरी अदालत, चलती नहीं किसी की वकालत"। खाटू श्याम इतिहास के अनुसार, द्वापर युग में जब बर्बरीक (श्याम बाबा) ने कुरुक्षेत्र के मैदान में कदम रखा, तो उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे उसी की तरफ से लड़ेंगे जो 'हारा हुआ' होगा। श्री कृष्ण ने उनके इस परम न्याय और सत्य को देखकर उन्हें कलियुग के सर्वोच्च न्यायकारी देव का पद दिया। खाटू धाम को 'परम अदालत' इसलिए कहा जाता है क्योंकि दुनिया के सताए लोग यहाँ आकर सीधे अपनी अर्ज़ी लगाते हैं और बाबा का फैसला बिना किसी गवाह या वकील के सीधे भक्त के हक में होता है। 'बनवारी' छाप और पूर्ण शरणागति का दर्शन: आखिरी अंतरे में आया शब्द "बनवारी और कुछ न कहना, हमको तेरी शरण में रहना" श्याम जगत के शिरोमणि लेखक श्री बनवारी जी महाराज की अमूल्य कलम को दर्शाता है। संतों के अनुसार, यह भजन 'माँगने' का नहीं बल्कि 'सौंपने' का है। जब भक्त कहता है कि "जो हुकुम माई बाप का", तो वह अपनी चिंताओं का सारा बोझ बाबा के कंधों पर डाल देता है और यहीं से उसके जीवन में चमत्कार होना शुरू होता है।
॥ इति ॥
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