मोहन अब हम तुमसे रूठे लिरिक्स - विनोद अग्रवाल | Mohan Ab Hum Tumse Ruthe Lyrics - Vinod Agrawal
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॥ जय श्री राम ॥
गोपाल ............. गोविन्द ............. गोपाल ................
शेर :- तुम ऐसे कोनसे खुदा जो कि में तुमसे कुछ उम्मीद भी न रखु , और न उम्मीद भी रहूं |
मोहन अब हम तुमसे रूठे - 2,
जान गए हम तुम हो छली प्रपंची, हो कपटी तुम झूठे |
पहले शरण बुलाया था, दे देकर लोभ अनूठे |
अबकी बार दर्श देने को तुमने दिखलाये अंगूठे |
मोहन अब हम ..............
मोहन अब हम तुमसे रूठे
सुनते है देते थे सबको, सब सुख भर भर मुठे |
हमने सत सत बिंदु बहाये, दिए न टुकड़े जुठे |
मोहन अब हम ..............
शेर :- और सब तो तेरी मेहफिल में बोसे ले जाम के,
और हम युहीं रहे तृष्णा लैब पैगाम के ||
मोहन अब हम तुमसे रूठे -२
गोपाल मुरलिया वाले नन्दलाल मुरलिया वाले |
श्री राधा जीवन नील मणि गोपाल मुरलिया वाले ||
क्या वो स्वाभाव पहला सरकार अब नहीं है |
दीनों के वास्ते क्या दरबार अब नहीं है |
या तो दयालु मेरी दृग दीनता नहीं है |
या दीन की तुम्हे ही दरकार अब नहीं है |
जिससे की द्विज सुदामा त्रिलोक पा गया था |
क्या उस उदारता में कुछ सार अब नहीं है |
दौड़े थे द्वारिका से, जिस पर अधीर होकर |
उस अश्रु बिंदु से भी क्या प्यार अब नहीं है |
गोपाल मुरलिया वाले .............
शेर :- ऐ शम्मा नहीं मिलने के युहीं तो परस्तार |
पहले तू खुद को जलायेगी फिर परवाने मिलेंगे ||
गोपाल मुरलिया वाले नन्दलाल मुरलिया वाले |
श्री राधा जीवन नील मणि गोपाल मुरलिया वाले ||
विशेष:- परम पूज्य विनोद अग्रवाल जी (Vinod Agrawal Ji) की अलौकिक शैली में गाया गया यह संकीर्तन 'मोहन अब हम तुमसे रूठे' भक्त और भगवान के बीच के मधुर और निश्छल प्रेम का प्रतीक है। इस भजन में एक भक्त ठाकुर जी से रूठने का स्वांग रचता है और उन्हें 'छली, प्रपंची और झूठा' कहता है, क्योंकि प्रभु ने उसे अपनी शरण में बुलाकर भी दर्शन नहीं दिए। विनोद अग्रवाल जी ने इसमें सुदामा जी की उदारता और द्वारिकाधीश के प्रेम का जो प्रसंग शेरो-शायरी के साथ जोड़ा है, वह सीधे रोंगटे खड़े कर देता है। "क्या वो स्वभाव पहला सरकार अब नहीं है" जैसी पंक्तियाँ हर रोते हुए भक्त के दिल की पुकार बन जाती हैं। यूट्यूब और फेसबुक पर इस संकीर्तन के क्लिप्स हमेशा ट्रेंडिंग में रहते हैं।
॥ इति ॥
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