तेरी गलियों का हूँ आशिक़ लिरिक्स - रसिक पागल बाबा | Teri Galiyon Ka Hoon Ashiq Lyrics - Rasik Pagal Baba
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॥ जय श्री राम ॥
शेर :- आशिक़ आशिक़ तो हर कोई कहंदा जे कहंदा ते कपटी |
आज तो दिया ने तपड़े साथो आड़ न जावे तपदी ||
तेरी गलियों का हु आशिक़ तू एक नगीना है |
तेरी नज़रो से ये मुझे जाम पीना है |
तेरी ..................||
1. तेरे बिना कोई दूसरा नहीं मेरा |
छोड़ू नहीं कस के पकड़ा है दामन तेरा |
तू मक्का तू ही काबा तू ही मदीना है |
तेरी ................||
2. मेरे हमदम मेरे साथी मेरे साथी हमदम |
तेरी ख़ुशी मेरी ख़ुशी तेरा गम मेरा गम |
तू लहू है तू जान है तू ही पसीना है |
तेरी ...............||
3. इस तरह सरहद पे बुल बुल आशियाना छोड़ दे
मैं न छोडूंगा तुझे चाहे जमाना छोड़ दे |
दिया है दर्द ये जो तूने तू ही दवा देगा |
तू ही दरिया तू ही साहिल तू सफीना है |
तेरी........ ||
विशेष:- वृंदावन के परम रसिक संत पूज्य रसिक पागल बाबा महाराज (Rasik Pagal Baba Maharaj) के श्रीमुख से निकला यह भजन 'तेरी गलियों का हूँ आशिक़' लौकिक प्रेम से ऊपर उठकर सांवरे सरकार के प्रति रूहानी दीवानगी का साक्षात स्वरूप है। भजन की शुरुआत में दिया गया शेर इस दुनिया के 'कपटपूर्ण' प्रेम को दर्शाते हुए प्रभु के प्रति सच्चे 'तप' की महिमा गाता है। इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका सर्वधर्म समभाव और सूफी रंग है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को ही "मक्का, काबा और मदीना" मानता है। तीसरे अंतरे में "तू ही दरिया, तू ही साहिल, तू सफ़ीना (नाव) है" जैसी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि संसार सागर से पार लगाने वाले भी केवल श्याम सुंदर ही हैं। पागल बाबा की अनूठी भाव-प्रधान शैली के कारण यह भजन ब्रज के संतों और रसिकों के बीच 'प्रेम रस' की वर्षा करने वाले भजनों में सबसे ऊपर गिना जाता है।
॥ इति ॥
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